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"लेखनी,तू क्या-क्या लिखती है!"

Posted On: 10 Mar, 2015 Others में

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मैंने अपने वरिष्ठ इंस्ट्रक्टर श्री जी.आर.चौधरी जी से जाना – लिखते वक्त हेड,हार्ट और हैंड तीनों इंटरकनेक्ट रहते हैं,इसलिए कोई भी इंसान ऐसा नहीं कर सकता,लिखे कुछ और ,सोचे कुछ और | वह जो सोचता है,वही लिखता है |
पर मैंने सोचा,लेखनी किस दशा,किस समय में क्या लिखती होगी |

लेखनी, ब्रह्ममुहूर्त में अरुणाभ लिखती है |
पूर्वाह्न में प्रस्थान,मध्याह्न में विश्राम एवं अपराह्न में आगमन लिखती है |
रात्रि के प्रथम पहर में शांति,द्वितीय में विश्रांति ,तृतीय में सृजन लिखती है |
संधि काल में तू भविष्य से मिलन,भूत का वियोग लिखती है |
लेखनी,शांत हो तो चिंतन करती है,चल पड़े तो परिवर्तन करती है |
प्रेम की चाह में श्रृंगार लिखती है,प्रेमी की चाह में विरह लिखती है |
क्रोधित होने पर अंगार लिखती है,प्रफुल्लित होने पर पुष्प झरती है |
उत्साहित होने पर समय से आगे चलती है ,अवसाद में काल को थमने का आदेश देती है |
सम्मानित होने पर स्वाभिमान लिखती है,अपमानित होने पर भूपों के दरबार उलटती है |
द्रवित हो तो दया,दुखी हो तो करुणा,उद्वेलित हो तो वीरता,ममत्व की दशा में वात्सल्य, मोहित हो तो माया,चाह हो तो उत्थान ,लोभ हो तो पतन,अहंकार हो तो सर्वनाश लिखती है|
किसान की लेखनी,अनाज को परिभाषित करती है |
मज़दूर की लेखनी ,परिश्रम को परिभाषित करती है |
लेखनी चाहे लकड़ी की हो ,अथवा चांदी या सोने की
वह भूत ,भविष्य और वर्तमान लिखती है |
अधिक क्या कहूँ तुम्हारी महिमा में ,
हे लेखनी ! किसी सत्यनिष्ठ-कर्मठ हाथों से तुम, ईश्वरीय सन्देश लिखती हो |



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shakuntla mishra के द्वारा
March 12, 2015

सच है लेखनी मन का दर्पण होता है !बहुत बढ़िया लेखन है बधाई !!

shakuntla mishra के द्वारा
March 12, 2015

बहुत बढ़िया लेख लिखा है आपने बधाई !लेखनी मन का दर्पण ही है !

pkdubey के द्वारा
June 30, 2015

sadar sadhuvaad aadarneeyaa.


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