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"कर्मकांड और भगवान"

Posted On: 20 Jan, 2015 Others,social issues,Religious में

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आजकल अपने देश में धर्म का भी बहुत ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है ,आये दिन कुछ दुखद घटनाएँ भी घटित हो रही | कभी पुजारी काटे जा रहे ,तो कभी मौलवी |कुछ एक को लगता है ,जैसे पूरा हिन्दू धर्म का भार उन्ही के कंधो पर हो,जोकि अत्यंत हास्यास्पद है | दूसरी ओर हमारे अंदर की निष्ठा कम हो रही और कर्मकांडी बढ़ रहे हैं ,जो भले ही सही से राम का भी उच्चारण न कर सके,लेकिन लोगो को मोक्ष बाटंते हुए घूम रहे ,काला कपड़ा दो ,शनि उतर जाएगा ,लाल कपडे दो ,मंगल उतर जाएगा आदि | कुछ ऐसे हैं जिन्हे लगता साल में एक बार सत्यनारायण की कथा करवा लो सब ठीक हो जाएगा अथवा कुछ को दिन भर तेज़ आवाज़ में गला फाड़कर राधे -राधे चिल्लाने से लगता ,बस भगवान को वो अपने जेब में ही डाले घूम रहे हों |
परन्तु ऐसा कदापि नहीं है अथवा ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कर्मकांड गलत है ,षोडशोपचार पूजन की क्या आवश्यकता है ,बशर्ते भाव से किया जाये तो, नहीं तो ७ क्या ७० परिक्रमा भी जीव का उद्धार नहीं कर सकती ,दिन भर घंटा बजाते रहो ,तो भी कुछ नहीं होगा ,यदि आप “मुंह में राम बगल में क्षुरी” वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हो तो ,क्यूंकि प्रभु अन्तर्यामी है और इंसान कितना भी ध्यान रखे ,लेकिन कुछ न कुछ त्रुटि तो हो ही जाती है कर्मकांड में ,कुछ आगे -पीछे हो जाएगा ,कुछ छूट जाएगा |
इसलिए कर्मकांड से भी ज्यादा जरूरी है अपने कर्म का शोधन और शुद्ध भाव |
हमारे बाबा जी के बड़े भाई ,ताऊ जी के बेटे ,उन्हें कर्मकांड का बहुत अच्छा ज्ञान था ,कुछ भी इधर -उधर हो तुरंत टोक देते ऐसा नहीं ,ऐसा होता है | उत्तर भारत में अखंड रामायण का पारायण किया जाता है,वो किसी बिना यज्ञोपवीत किये हुए नए किशोर लड़के को रामायण नहीं पढ़ने देते थे और उन्हें रामायण का इतना अच्छा ज्ञान भी था ,यदि किसी चौपाई में “को” के स्थान पर “का” पढ़ दिया तुरंत कहते सही से पढ़ो ,”का ” नहीं “को ” है |
पर हमारे बाबाजी का नरम स्वाभाव ,उनके सामने तो कुछ नहीं कहते थे ,बड़े भाई होने के कारण ,पर बाद में कहते पढ़ो यार ,पढोगे नहीं तो पढ़ना आएगा कैसे ,बच्चों को तो अवश्य पढ़ना चाहिए रामायण |
अतः भगवान भाव से पाया जाता है ,ध्यान से खोजा जाता है ,जीव दया करने से उसकी कृपा बरसती है,कर्मकांड एक छोटा माध्यम है न कि भगवान |



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shakuntlamishra के द्वारा
January 22, 2015

सत्य कहा आपने हमारा धर्म तो विज्ञानं की बराबरी में हैं !कुछ पाखंडी और अज्ञानी इसे अपने अनुसार बोलते है . सत्य भक्ति भाव से अनेको ने ईश्वर की कृपा प्राप्त की है !

nishamittal के द्वारा
January 23, 2015

भाव,श्रद्धा और दान के लिए सुपात्र का महत्व है.साथ ही अपने कर्म पुनीत होना

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
January 23, 2015

प्रिय दुबे जी सुन्दर और सराहनीय आलेख , एक कहावत है न मन चंगा तो कठौती में गंगा, प्रभु हमारे मन में हैं सदा साथ हैं सर्वज्ञ हैं सब कुछ अच्छा किया जाए सब का मंगल हो अब मानव योनि में और कलयुग में हैं तो कुछ तो यों होता रहता है भ्रमर ५

pkdubey के द्वारा
February 9, 2015

sadar sadhuvaad bhaisahab.

pkdubey के द्वारा
February 9, 2015

sach kahaa aadarneeyaa.sadar sadhuvaad.

pkdubey के द्वारा
February 9, 2015

haan aadarneeyaaa.


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