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"राम और काम"

Posted On: 9 Sep, 2014 Others,social issues,Religious में

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आज हमारे समाज के कुछ समूह ,”पियो ,खाओ और ऐश करो” के सिद्धांत पर ही जीवन जी रहे हैं,उनके विचारानुसार हमारी संस्कृति में सेक्स एक तैबू है जिस पर खुले आम चर्चा करने से हाय -तौबा मचने लगती है ,हमारे देश में | पर मेरे विचारानुसार सेक्स तैबू नहीं ,एक मर्यादा है |
मेरे प्राइमरी का एक विकलांग साथी पढाई में बहुत अच्छा ,बहुत सुन्दर हैंड राइटिंग,५ वी क्लास से ही गलत रास्ते पर चल दिया और १० वी में आते-आते fail हो गया,पढाई छूट गयी,एक दिन खेत पर जब मैं बाबा जी के साथ कृषि कार्य में सहयोग कर रहा था ,तो बाबा जी ने पूछा-तुम्हारा वह मित्र कैसा है? मैंने कहा -अब पढाई छोड़ दी उसने ,बाबा बोले -अरे ! पढ़ लिख लेता ,तो कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाती ,और विकलांग इंसान के लिए सरकारी नौकरी में आरक्षण भी होता है ,सरकारी नहीं तो प्राइवेट ही सही,तभी मुझे समझ में आया यह आरक्षण क्या होता है | टीन ऐज(thirteen to nineteen ) बनने विगड़ने का समय होता है ,इस उम्र में काम चिंतन तुम्हारा विनाश और राम चिंतन तुम्हारा कल्याण कर सकता है|
ऐसी ही एक दूसरी सत्य कथा-एक चार बच्चों की माँ,बड़ा लड़का लगभग १८ वर्ष का,जो गाजियाबाद में नौकरी करता था ,और उसके तीन बेटियां,उसका पति बहुत सीधा और कर्मठ,उस अधेड़ उम्र की महिला ने कुसंग में पड़कर अपने पति की ह्त्या करवा दी और उसका दोष अपने दो देवर पर लगा दिया | किसी तरह से देवर छूटे और अपराधी पकड़ा गया,यह कुसंग का भयावह परिणाम है,स्त्री कब वहक जाये ,कैसे वहक जाये,कोई नहीं जानता,जरूरी नहीं सेक्स ही जिसकी वजह हो और बाद में पश्चाताप के अलावा कुछ शेष नहीं रहता | अतः स्त्री के लिए ईश्वर आराधना ,राम चरणो में रति होना ,पुरुष से भी ज्यादा जरूरी है |
ऐसा ही एक तीसरा उदाहरण,हमारे फूफा जी के बड़े भाई ,श्री हरी नारायण तिवारी,बचपन से ही काम(सेक्स) की कोई इच्छा नहीं,कृषि का कार्य करते और बाहर मंदिर में बैठे रहते बच्चों के साथ खेलते ,मात्र भोजन के लिए घर में आते,उनकी युवावस्था में गांव के कुछ सोहदों ने एक महिला को कुछ पैसों का लालच देकर ,खेत में कार्य करते वक्त उनके पास जाने को कहा | महिला गयी,तो वो जिस हासिये (sickle) से फसल काट रहे थे ,उसी से उन्होंने उस महिला को बहुत मारा,किसी तरह से वह महिला वहां से जान बचाकर भागी ,बाद में यह बात सबको मालूम पडी,जब उस महिला ने गांव में आकर पूरी कहानी का बखान किया |
अतः साथियों,मनुष्य ,पशु -पक्षियों की भांति खुले आम तो सेक्स क्रीड़ा नहीं कर सकता और न ही बाल -बच्चों के बीच में बैठकर सेक्स एजुकेशन का पाठ पढ़ा सकता,वह समाज और समूह में बैठकर परमार्थ चिंतन,ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण और परोपकार के पथ पर आगे बढ़ने की ही चर्चा कर सकता है,यही मेरा मानना है और यही भारतीय संस्कृति है |



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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
September 9, 2014

उत्तम विचार डूबे जी सादर aabhaar

pkdubey के द्वारा
September 9, 2014

sadar sadhuvaad aadarneey.

sadguruji के द्वारा
September 10, 2014

आदरणीय दुबे जी ! अत्यंत विचारणीय रचना ! इस उत्कृष्ट रचना के सृजन के लिए अभिनन्दन और बधाई !

pkdubey के द्वारा
September 11, 2014

sadar sadhuvad aadarneey.

Ravinder kumar के द्वारा
September 12, 2014

श्रीमान जी, आपका लेख कहीं ना कहीं समाज की वर्तमान स्तिथी बता रहा है. रिश्तों में धोखा एक अपराध है, जिसके लिए पुरुष और स्त्री समान रूप से जिम्मेदार हैं. ईश्वर आराधना ,राम चरणो में रति दोनों के लिए ही जरुरी और कल्याण का मार्ग खोलती है. आपकी बेबाकी अच्छी लगी. शुभकामनाएं.

Ravinder kumar के द्वारा
September 12, 2014

श्रीमान जी, आपका लेख कहीं ना कहीं समाज की वर्तमान स्तिथी बता रहा है. रिश्तों में धोखा एक अपराध है, जिसके लिए पुरुष और स्त्री समान रूप से जिम्मेदार हैं. ईश्वर आराधना ,राम चरणो में रति दोनों के लिए ही जरुरी और कल्याण का मार्ग खोलती है. आपकी बेबाकी अच्छी लगी. शुभकामनाएं..

pkdubey के द्वारा
September 13, 2014

sadar sadhuvaad aadarneey.rishtey -nate hee ek achchhe samaj kee mazboot neev hain ,jis par koi rashtra khadaa hotaa hai.par aaj hamaraa samaj bhut bahak chukaa hai,aaye din koi buree ghatnaa hee sunne ko miltee hai.

Sushma Gupta के द्वारा
September 13, 2014

आ. दूबे जी, ”राम” के प्रति अनुराग..अर्थात ईश-पूजा से मनुष्य स्वयं को कुमार्गी होने से बचा सकता है…श्रेष्ट चिंतनीय आलेख …बहुत वधाई..

pkdubey के द्वारा
September 15, 2014

sadar sadhuvaad aadarneeyaaa.

jlsingh के द्वारा
September 19, 2014

अतः साथियों,मनुष्य ,पशु -पक्षियों की भांति खुले आम तो सेक्स क्रीड़ा नहीं कर सकता और न ही बाल -बच्चों के बीच में बैठकर सेक्स एजुकेशन का पाठ पढ़ा सकता,वह समाज और समूह में बैठकर परमार्थ चिंतन,ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण और परोपकार के पथ पर आगे बढ़ने की ही चर्चा कर सकता है,यही मेरा मानना है और यही भारतीय संस्कृति है | आदरणीय दुबे जी, यही यथार्थ भी है जो परमार्थ का मार्ग प्रशस्त करता है… बहुत ही श्रेष्ठ उदाहरण के साथ behtar prastuti!

pkdubey के द्वारा
September 19, 2014

sadar sadhuvaad aadarneey.karykhetra kee kuchh vyastataa ke kaaran kuchh nayaa likhne me asmarth hoon.samay ke sath punah lekhan kary prarmbh karne kee cheshtaa karoongaa.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 10, 2014

प्रिय दुबे जी सुन्दर और प्रेरक लेख ..काश लोग अपने आत्म सम्मान को ऐसे ही बल दें शान से जियें सुन्दर भ्रमर ५

pkdubey के द्वारा
October 13, 2014

sadar sadhuvaad aadarneeybhaisahab.


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