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"अफसर,अपराध और समीर"

Posted On: 28 Aug, 2014 Others,social issues में

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कुछ माह पूर्व ग्वालियर में एक एनकाउंटर हुआ,जिसमे समीर नामक अपराधी मारा गया,उसकी विस्तृत जानकारी मैंने अमर उजाला में पढ़ी -
http://www.amarujala.com/feature/states/uttar-pradesh/criminal-sameer-jat-life-story-hindi-news-rk/
जिसका सार यह है,एक अधिकारी के योग्य इंसान अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए कुख्यात अपराधी बन गया,उसकी पिता की मौत करने वाले ने भी किसी मौत का बदला लिया होगा,सबका कांसेप्ट एक ही -खून का बदला खून |भारत देश की सभ्यता और संस्कृति में एनकाउंटर,मर्डर ,फांसी जैसे शब्द डरावने और भयानक होते हैं,कोई भी नेक दिल इंसान इस रास्ते पर कभी नहीं चलना चाहेगा,पर रिश्तों -नातों की अहमियत,किशोर उम्र में दिमाग में आने वाले विचार,मैं सही कर रहा हूँ -यह सोच,गीता का कृष्ण -अर्जुन संवाद हथियार से डरने वाले को भी हथियार उठाने के लिए विवश करने के साथ ,आत्मबल भी देता है,और तभी तो अपने दूसरे सहोदर भाई -बहनो से हटकर भविष्य का एक अधिकारी ,अपराधी बन गया | वह कितना सही था और कितना गलत इसका मूल्यांकन नियति ही कर सकती है,कानून कदापि नहीं |
क्या आज के बुद्धिजीवियों,सिंघासनासीन व्यक्तियों,कानून के रखवालों , पैरोकारों और न्यायाधीशों को यह सोचने की आवश्यकता महसूस नहीं होती,कि हमारे समाज में अपराध का प्रारम्भ और अपराधी का जन्म ही न हो,क्या पोलिस का सर्वोत्तम बल,सेवा -शांति का उद्घोष, अपराध होने के बाद में अपराध स्थल पर तिलांजलि और श्रद्धांजलि देने के लिए और मृतकों का पोस्टमॉर्टेम करने के लिए ही बनाया गया है ?क्या देश की आतंरिक सुरक्षा में कार्यरत प्रत्येक सिपाही का कर्म गश्त लगाना और अपने हथियार साफ़ करना है? क्या प्रत्येक समाज के ठेकेदार और जमीदार केवल अपना ही पेट भरने के लिए और अपनी बैंक की तिजोरिया भरने के लिए ही जीवन का मूल मंत्र समझते हैं?क्या देश के मंदिरों में आराम से स्तवन का उद्घोष करने वाले महंत ,मठाधीश का उत्तरदायित्व मूर्ती के पास ही खड़े रहना है? आदि अनेक प्रश्न इस देश के चिंतनशील मश्तिष्क में अनवरत घूर्णित हो रहे हैं,पर इनका उत्तर कौन और कब तक देगा,यह सुनिश्चित नहीं है|
“जय भवानी”



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