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"भारत की तकदीर और तस्वीर"(जागरण जंक्शन फोरम)

Posted On: 13 Aug, 2014 Others,social issues,Junction Forum में

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“माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्या” को पुनः -पुनः संस्मरण करते हुए इस जन्मभूमि को मैं प्रणाम करता हूँ | बचपन के दिनों में मैं जब पाठ्यक्रम की पुस्तकों में वैज्ञानिक ,साहित्यकारों आदि को पढता था,तब मैं सोचता था सब कुछ तो यही लोग कर चुके हैं ,मुझे तो कोई काम मिलेगा नहीं | सारा शोध कार्य,लेखन कार्य आलरेडी हो चुका है,मैं क्या करूंगा,बस कहीं गांव से दूर नौकरी मिल जाये,मैं आत्मनिर्भर बन जाऊँ अतिशीघ्र | हमारे चचेरे मामा जी, जब बी.यससी. के प्रथम वर्ष में कानपूर में पढ़ रहे थे,तभी उनका सिलेक्शन एयरफोर्स में हो गया था | मैं भी एयरफोर्स में जाने के सपने बुनने लगा और जैसे ही हाई स्कूल पास किया, एयरफोर्स में फॉर्म डाला | पर एक बार नॉन टेक्निकल ट्रेड में HEIGHT ही कम निकली ,दूसरी बार टेक्निकल ट्रेड में एग्जाम में असफल हो गया, ऐसे अवसर पर जब सफल होने वाले ७ और असफल ७०० हों,तब इंसान को बहुत बल मिलता है,उसे ऐसा लगता मैं ही अकेला असफल नहीं हुआ और आगे चलने का आत्मबल मिलता है | इस तरह आत्मनिर्भर होने में बहुत वक्त लग गया,नियति में हर घटना एक निश्चित समय पर ही घटित होती है,मानव कितना भी प्रयास कर ले पर नियत समय से पूर्व कुछ नहीं कर सकता,प्रयास रत रहना ही मनुष्य का धर्म है | मैं भी किसी छोटे शहर में, गांव के पास, रहने का सदैव इच्छुक रहा,पर कुंडली के प्रथम गृह में विराजित शनिदेव ने कभी मुझे चैन से एक जगह बैठने नहीं दिया,शायद जीव को यत्र -तत्र विचरण करवाना ही उनका मूल उद्देश्य हो,पर वह जीव को अनेक अनुभवों से भी परिपूर्ण कर देते हैं|
भारत की तस्वीर देखने का मुझे बहुत अच्छा अवसर मिला,विशाल भूखंड में फैला हुआ एयरपोर्ट मुझे प्रतिदिन अपने गांव के ऊसर की स्मृति अनायास ही करवा देता है,बस फर्क मात्र इतना है,वहां जानवर चरते थे और यहां मज़बूत कंक्रीट से घिरे हुए क्षेत्र के बीच हवाई जहाज़ उड़ते और उतरते हैं | उस गांव के ऊसर में साथी चरवाहे परियों की कथा सुनाते थे,किस्से -चुटकुले होते थे,अपनी आप बीती सुनाते थे,कभी -कभी मैं चाव से सुनता ,तो कभी उन सब दूर दूसरे कोने में बैठ “नमक के दरोगा” के बीच खो जाता और अंत होते होते मुझे भी लगता,ऐसा सजीला रथ मेरे सामने कब आएगा और कोई मुझसे भी उसपर सवार होने का विनम्र आग्रह करेगा,आसमान की ओर निहारते हुये ऐसे दिवास्वप्न में डूबे रहकर कभी -कभी मेरी नज़र ३६००० फ़ीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए एक माचिस जैसे आकार के जहाज़ पर पड़ती,मैं सोचता यह तो बहुत छोटा है,इसके अंदर उड़ने वाला आदमी इसमें बैठता कैसे होगा,पर नियति ने वह भी बहुत अच्छे से समझा दिया |
बाल्यावस्था के दौरान जब मैं किसी के हाथ में घड़ी देखता,एक अच्छा सूटकेस देखता,आँखों पर चढ़ा हुआ चश्मा देखता,तब मुझे लगता यह सब मेरे पास कब होगा,पर नंगी आँखों से इतना सब कुछ देखने के बाद ,अब किसी भी प्रकार का चश्मा चढाने की कोई इच्छा ही नहीं बची, समय देखने और उसके बारे में जानने का ज्ञान आप को होना चाहिए,घड़ी तो आप के आसपास बहुत मिलेगी | आज जब मैं अपने आसपास लगभग हर इंसान के हाथ में एक मोबाइल देखता हूँ,तो मुझे लगता हाँ भारत अमीर हो रहा है,पर मोबाइल में गेम खेलते हुए युवाओं को देखकर चिंता होती है,इस देश की तस्वीर कैसे बदलेगी | बिरले ही ऐसे नज़र आते हैं,जो मोबाइल के माध्यम से कुछ गहन अध्ययन करने में व्यस्त हों|
आज देश में बहुत कुछ बदलने की आवश्यकता है,जिसके लिए प्रत्येक युवा को कटिबद्ध होना पडेगा,नहीं तो जवानी के दिन कब चले गए,हमें पता भी नहीं लग पायेगा |
“जय हिन्द,जय भारत”



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
August 13, 2014

आदरणीय दुबे जी ! सादर अभिनन्दन ! बहुत सार्थक और विचारणीय लेख ! बहुत बहुत बधाई !इस देश की आज की एक बहुत बड़ी सच्चाई आपने बयान की है-”आज जब मैं अपने आसपास लगभग हर इंसान के हाथ में एक मोबाइल देखता हूँ,तो मुझे लगता हाँ भारत अमीर हो रहा है,पर मोबाइल में गेम खेलते हुए युवाओं को देखकर चिंता होती है,इस देश की तस्वीर कैसे बदलेगी | बिरले ही ऐसे नज़र आते हैं,जो मोबाइल के माध्यम से कुछ गहन अध्ययन करने में व्यस्त हों|”

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 13, 2014

बाल्यावस्था के दौरान जब मैं किसी के हाथ में घड़ी देखता,एक अच्छा सूटकेस देखता,आँखों पर चढ़ा हुआ चश्मा देखता,तब मुझे लगता यह सब मेरे पास कब होगा …………तब अभावों में खुशियाँ थीं ,अब खुशियों में अभाव है प्रवीण जी ,आजकल ३ साल के बच्चे मोबाईल गेम खेल रहे हैं,क्या होगा इस देश का —आपका आलेख बहुत सार्थक है ,हार्दिक बधाई .

pkdubey के द्वारा
August 14, 2014

sadar sadhuvaad aadarneey.

pkdubey के द्वारा
August 14, 2014

sach kahaa aadarneeyaa.avshy hee anavshyak aur vinaa kuchh paye jane vale karyon me lage rhnaa desh ke liye ghatak hai.aaj is desh ke har ek yuvaa ko kuchh sarthak karne kee ati mahtee aavshyakytaa hai.sarkaar ko bhee is dishaame anek kadam utthane chahiye.


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