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"व्यर्थवाद"

Posted On: 31 May, 2014 Others,social issues में

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इस देश में बोलने बालों की कमी नहीं,किसी भी क्षेत्र में ,किसी भी ऑफिस में,खेतों -खलिहानों में,चौक -चौपालों में,गली -मुहल्लों में,गांव -शहर में,सड़क पर -संसद में, बस -ट्रैन में,हॉस्पिटल -हॉस्टल में ,लगभग हर जगह भरमार है ऐसे लोगों की. जिन्हे सुनकर भी ऐसा लगता,पता नहीं कितना ज्ञान है इनके पास. मानो ये दुनिया की हर समस्या का समाधान अपनी बातों से ही कर सकते हो.पर इन्हे क्या पता -बोलने से सबसे अधिक एनर्जी का व्यय होता है ,यदि यह छोटा सा सत्य पता होता . तो इतना क्यों बोलते ये, अलग -अलग जगह पर अलग-अलग नामों से पहचाने जाने वाले ऐसे व्यक्ति.
आदरणीय प्रताप नारायण मिश्रा का एक लेख था -”बात”,१२ वी की गद्य पुस्तक में,शायद पहला ही चैप्टर था वो.
ऐसे ही “भारत वर्ष उन्नति कैसे हो सकती है” के विचारक श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कहा-कब तक “सर पर कमबख्ती का छाता और आँखों पर मूर्खता की पट्टी बाधें” हम जीते रहेंगे. पर हम कितना भी पढ़े,वकवास नहीं छोड़ सकते.हमने केवल बोलना सीखा,कुछ करना सीखा ही नहीं. यदि हम अनर्गल प्रलाप की जगह,कुछ तकनीक और विज्ञान सीखते, तो आज कहीं और होते,शायद अपने आप को और अपने राष्ट्र को विकसित कहला सकते थे. पर हम तो हम हैं, अपने आगे किसी की सुनते ही नहीं.अपनी गलती का भी हम नगाड़ा बजाकर प्रचार करेंगे,इतने बड़े देश में १-२ लाख या करोड़ तो SUPPORTER तैयार करना मामूली बात है.
फिर क्या, हमारी जय -जय कार ,बाकी सब बेकार. एक कहावत है न, ढोलक के ऊपर -” मढ जाये ,फिर तो हवा में बजती है”. चाहे “ढोल के भीतर ,पोल” ही क्यों न हो.हमें तो बजने से मतलब,चाहे संगीत बेसुरा ही निकले.
पर कब तक बजते रहोगे यार,कभी अपना “अंतर्नाद” भी सुनो,जिसे सुनकर फिर कभी बजने की आवश्यकता तुम्हे महसूस ही नहीं होगी.

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