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"अरविन्द केजरीवाल" जागरण जंक्शन फोरम

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पिछले कुछ दिन के दिल्ली के राजनैतिक घटनाक्रम को देखकर मैं व्यक्ति विशेष पर ब्लॉग लिख रहा हूँ. वैसे तो मैं परहेज़ करता हूँ,किसी राजनैतिक व्यक्ति के ऊपर सीधी टिप्पणी करने से. दिल्ली में किसी की भी सरकार आये -मैं तो “सत्यम परम धीमहि” और “सीताराम(युगल) सरकार” को मानने वाला हूँ.मेरे पूर्वज और मैं हमेशा -”हर -हर शम्भो” का ही उद्घोष करना चाहते हैं और आगामी पीढ़ी से भी यही अपेक्षा रखेंगे. लेकिन देश की हर हलचल को जानना भी हमारा जन्मसिद्ध कर्तव्य है.
देश की राजधानी दिल्ली में अन्ना आंदोलन चालू था. मैं मुंबई में टेलीविज़न पर इसे लगातार फॉलो कर रहा था.तीसरे या चौथे दिन मेरे पास अकस्मात फ़ोन आया -सुरेश आचार्या जी का ,जो कि मुंबई में जनता को अन्ना आंदोलन से जोड़ने का काम कर रहे थे.रोज-रोज टेलीविज़न देखकर भी इंसान बोर होने लगता है,अतः हमने सोचा- संडे को सुरेश आचार्या के द्वारा बताये गए स्थान पर उनसे मिलना चाहिए, थोड़ा बाहर का भी जायजा लिया जाये.मैं उनसे दिन में लगभग ४-५ बजे के करीब सांताक्रुज में मिला.बहुत से अन्य लोग भी वहां आये हुए थे.सबके पास अपने -अपने अच्छे विचार,देश को सुधारने के लिए. मैं एक मूकदर्शक की भाति चुपचाप सब को देख -सुन रहा था.धीरे -धीरे मैं हर एक संडे को उनसे मिलने लगा.अन्ना मूवमेंट के अँधेरी ऑफिस में जाने लगा.३-४ बार मैं ,उधर गया.कुछ दिनों के बाद अन्ना का मुंबई में बी.के.सी ग्राउंड में आंदोलन होने वाला था,उस दौरान मुझे अरविन्द केजरीवाल को भी करीब से देखने -सुनने का मौका मिला,शायद इतने करीब से ,जितना करीब मेरे सामने मेरा पी.सी.(कंप्यूटर)रखा हुआ है. अब एक ex iitian ,ex i.r.s. अफसर की टैलेंट के ऊपर हमारा संशय करना, मूर्खता का ही परिचायक होगा.
पर राजनीती की परिपक्वता उनमे नहीं है,यह सब विगत कुछ माह के घटना क्रम से स्पष्ट हो गया.
कोई भी अच्छा सामाजिक परिवर्तन एक या दो दिन में नहीं हो सकता,सिवाय दैवीय प्रकोप या आपदा के(जैसे सुनामी ,केदारनाथ की त्रासदी आदि ). कुछ अच्छा करने में बहुत समय लगता है,ऊपर उठने में वर्षों लग जाते हैं,गिरने में कुछ एक पल.
मेरा ऐसा व्यक्तिगत विचार है -अन्ना आंदोलन से पूर्व यह सुनिश्चित हो चुका था-अरविन्द पार्टी बनाएंगे ,चुनाव लड़ेंगे. जो सब हुआ ,आप सब ने और मैंने भी देखा.
आज के दिल्ली के राजनैतिक पटल पर मैं अपनी दृष्टि केंद्रित कर के यही कहना चाहता हूँ -अरविन्द को दिल्ली बिधानसभा में बी.जे.पी. को सपोर्ट देना चाहिए और दिल्ली में सरकार बनवा देनी चाहिए. ताकि पुनर्मतदान का बखेड़ा न खड़ा हो,यदि “सिर्फ हंगामा खड़ा करना आप का मकसद न हो तो”. नहीं तो अन्य पार्टियों जैसा “आप” का भी अस्तित्व खतरे में है. शायद दिल्ली की जनता भी यही चाहती होगी, अरविन्द आवश्यक समझे तो इस पर जनता की राय भी ले लें.



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