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pkdubey


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“सोशल लाइफ बहुत आवश्यक है”

Posted On: 4 Apr, 2016  
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“अपने काम से काम रखो”-बाबा जी का हितोपदेश

Posted On: 30 Mar, 2016  
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“बाबा जी के दृष्टांत “——पंचम

Posted On: 18 Mar, 2016  
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“पढ़े तो पढ़े कैसे??????”

Posted On: 9 Mar, 2016  
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“मैं अपने दोस्तों से हमेशा अलग रहा”

Posted On: 5 Mar, 2016  
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सादर साधुवाद आदरणीया ,प्रितिक्रिया के लिए | वैसे शाब्दिक अर्थ में -मही का अर्थ -पृथिवी और सुर का अर्थ -देवता | अर्थात जो पृथ्वी पर देव रूप से विचरण कर रहे हैं -देव का अर्थ जो देने की अभिलाषा रखता है ,वैसे लोक चर्चा में महिसुर -ब्राह्मण को समझा जाता है ,पर मेरे विचार से -संत रविदास भी महिसुर अथवा महिसुर से भी बहुत ऊपर उठ चुके व्यक्तित्व थे | कश्यप ऋषि के दो पत्नियां थी -दिति एवं अदिति | दिति से दैत्य हुए और अदिति से देव | दैत्य भी शिव ,शक्ति ,नारायण ,ब्रह्म आदि के उपासक थे ,पर वह समाज का शोषण करना चाहते थे | देवता भी इन सबके उपासक थे -पर वह समाज का पोषण करते थे | जो पृथिवी पर समाज का पोषण करना चाहे वह महिदेव ,महिसुर है और जो समाज का शोषण कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहे वह महिषासुर है | आशा है ,मेरा विचार आप को उचित लगेगा | सादर नमन |

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सादर साधुवाद आदरणीया ,सादर नमन माते,एक बार आस्था चैनल पर पूज्यनीय किरीट जी का भागवत वर्णन सुन रहा था -जिसमे उन्होंने कहा -भगवान के गले में जो मणियों की माला है ,इसमें में जो मणि हैं ,वो ब्रह्मर्षि ,महर्षि हैं ,तब मुझे अधिक/पूर्ण विश्वास नहीं हुआ ,पर अब जब घर पहुंचता हूँ -तो २-३ वर्ष का बालक गलहार बनकर कहता है -पापा मैं आप का वेट कर रहा था ,तो किरीट जी का वक्तव्य पूर्ण सत्य समझ में आता है ,अवश्य ही महर्षि ,ब्रह्मर्षि ,सिद्ध ,योगी -परमात्मा के गलहार ही होंगे ,परमात्मा को मणियों की क्या आवश्यकता | एवं संसारी जीव की तपन तभी मिटेगी ,जब वह परमात्मा से भेटेँगा,रामचरितमानस में प्रभु सबसे गले मिले-भरत से सबसे अधिक मिले ,कृष्ण हर गोपी के गले मिला,हमारे यहाँ जब पुत्री विदा होती है -सबसे भेंटकर रोती है ,भेट्ने से जो भावनात्मक ब्लॉकेज रहते ,वह मिट जाते है ,नेगेटिव एनर्जी ख़त्म होती है ,पॉजिटिव का संचार होता है ,कोई अधिक दुखी जीव हो ,उसके कंधे पर हाथ भी रख दे कोई ,पीठ भी थपथपा दे ,तो उसे नयी ऊर्जा मिल जाती है ,शायद इन सबके पीछेे भी कोई विज्ञान है | सादर |

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आज का भारत अपनी जवानी और समय का सदुपयोग करने में असमर्थ है,कल न्यूज़ -२४ पर देखा- u p के ९ जिले ,जले | जिसमे कन्नौज में दुर्गा मूर्ती के विसर्जन के दौरान किसे के गुलाल डालने से दंगा भड़क गया,मानवीय मष्तिष्क की आक्रामकता तो देखिये -गुलाल से भी दंगे हो रहे हैं | इस मामले में मुंबई सही है -पुरुष और नारी वर्ग अनुशासन से चलते हुए गणपति और दुर्गा उत्सव MANAATE हैं | आज के बेरोजगार युवा को स्काउट या ncc जैसी संस्था को ज्वाइन करना चाहिए ,ताकि जीवन में अनुशासन आये ,नहीं तो आपस में ही मरकर खतम हो जाओगे | यदि किसी की ऐसी सोच है -जीवन ,मरने के लिए ही मिला ,तो पूर्णतः गलत है,उस माँ से पूछो जिसने तुम्हे जाया -९ माह तक एक -एक दिन गिन-गिन कर काटा और अंत में जिंदगी -मौत से जूझ कर तुम्हे पैदा कर सकी | दिशा बदलने से दशा बदल सकती है ,अतः परिवर्तन करना सीखो | एक बार गांव की एक महिला ,जिसकी बहू ,प्रसव वेदना के कारण अंत्यंत परेशान ,बाबा जी के पास आयी और कहा -बताओ कुछ दद्दा,बहू बहुत परेशान है ,बाबा जी ने पंचांग देखकर बताया -चारपाई घुमा दो ,बहू का मुंह पूरब की और कर दो | उसने जाकर वह सब किया और थोड़ी देर बाद वह पुनः आयी और बोली ,नाती हो गया ,सब ठीक है | मैंने बाबा से पूछा -यार ,क्या बताया तुमने ? बोले -चन्द्रमा ,पीठ पीछे थे ,पीड़ा दे रहे थे,चारपाई घूमने से सामने आ गए ,कष्ट दूर हो गया |बाकी ,सब हरी इच्छा | अतः दिशा बदलना सीखो ,मेरे युवा मित्रो | कल्याण होगा |

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सादर साधुवाद आदरणीया | अवश्य ही हिंदी साहित्य बहुत रुचिकर और सरल है ,तनाव से मुक्ति देता है | पर हम विज्ञान और गणित विदेशियों का पढ़ रहा है ,हम रामानुजम और आर्यभट्ट को नहीं ,डार्विन और आर्कमिडीस को पढ़ते है | हम डार्विन के सिद्धांत के अनुसार यह तो विश्वास कर लेते हैं -गेंहूँ और मिट्टी के मेल से चूहे या घुन की उत्तपत्ति हो जाती है ,पर हमें यह विश्वास नहीं होता -व्यास के दृष्टिभोग से बच्चे कैसे जन्म हो गए | पर कुछ भी हो ,भारतीय वैज्ञानिक आज भी सबसे महान हैं - सर हरगोविन्द खुराना के अनुसार,पेड़-पौधे में भी जीव रहता है ,वह भी सुख-दुःख का अनुभव करते हैं | यही तो भारतीय खोज है -यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ,ब्रह्ममय ही है |

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सादर आभार आदरणीया | जब से मैंने याद सभाँली तब से चल ही रहा हूँ ,नाना प्रकार के लोगों से मुलाकात होती हैं | बाबू जी के साथ दूसरी बार प्रधानपुर ,बलिया जा रहा था ,हरदोई से शाहगंज की ट्रैन पकड़ी ,मेरी उम्र ९ वर्ष थी ,हरदोई में बच्चा टिकट नहीं थी ,वहां क्लर्क ने कहा ,अगले स्टेशन से ले लेना | अगला स्टेशन आने पर मैंने बाबू जी से कहा -मेरी टिकट?,तो उन्होंने कहा -अब तुम्हे यहां डिब्बे में छोड़कर,कहाँ जाऊँ टिकट लेने ,पता नहीं ऑफिस कितनी आगे होगा ? हम शाहगंज पहुंचे तो TC मिल गया ,बाबू जी अपनी टिकट दिखाई और कहा ,हरदोई में बच्चा टिकट नहीं थी ,टिकट के १० रुपये आप ले लो ,वह बोला नहीं -५० रुपये दो ,नहीं तो जेल | बाबू जी ने कहा -हरदोई टेलीफोन कर के पूछ लो ,वहां टिकट है कि नहीं| वह बोला -ऐसा कुछ नहीं ,जेल चलो | मैं डर गया,बाबू जी मुझे लेकर TC के आगे -आगे चलने लगे | लगभग १० कदम चले ,TC बोला रुको ,१० रुपये ही दे दो | बाबू जी ने कहा -नहीं ,अब तो मैं जेल ही जाऊंगा | आखिरकार वह वापस चला गया ,बोला जाओ आप | उस उम्र में मैंने २ बातें सीखी - किसी से डरो मत | यदि आप सही हो ,तो कुछ भी नहीं होगा आप का |

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कल मैंने उपरोक्त नंबर्स पर कॉल करने की पुनः कोशिश की जिसमे से लड़कियों के नंबर्स, बंद हैं ,अभिषेक दुबे (0९९५३६५६७७०) के कॉल को रिसीव किया गया,उस व्यक्ति ने कहा -मैं रोहित शर्मा उनका असिस्टेंट हूँ | बनवारी लाल गुप्ता के मोबाइल (०९०१५०५५३७७) को भी रिसीव किया गया और उधर से कहा ,मैं उनका असिस्टेंट निर्मल जैन हूँ | मैंने उनके ऑफिस का अड्रेस जानने की कोशिश की तो कोई रिप्लाई नहीं दिया और कॉल कट कर दी | अभिषेक के नंबर से यह मैसेज आया -NAME-KISHOR BHAI M BHATT,A/N-56288058537,IFSC CODE-SBIN0060288.BAAD ME MAINE USSE BRANCH POOCHAA ,TO BHAVNAGAR GUJRAAT BATAYAA. NOW MY WORRY IS-THEY MAY TAKE MONEY FROM OTHER FELLOWS. KYUNKI -ABHISHEK BOL RHAA THAA,SIR,SUBAH SE BHUT BUSY HOON, EK MOTIHARI,BIHAR KAA CASE THAA USKAA KAAM KARVAA RHAA THAA. AISE LOG BHEE IS DESH ME FAL-FOOL RHE HAIN,AUR HAM UN PAR KUCHH KAR BHEE NAHEE SKTE. ACTUALLY MAIN POLICE BAGAIRAH ME HOTAA,TO BATAATAA UNKO.ASAMBHAV KUCHH BHEE NAHEE. YADI KOI S.B.I. BANK EMPLOYEE MERE LEKH KO PADHE AUR US KHATE KEE JANKAAREE KARE,TO ACHCHHAA HAI. AISE RACKET BAND HONE CHAHIYE.

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श्री दुबे जी बहुत दिनों बाद आपका लेख पढ़ने को मिला सटीक लेख आपने बहुत अच्छे विचार दिए हैं "देश को आवश्यकता है ,बड़े पैमाने पर रोजगार की -जो कि इंफ्रास्ट्रक्चर ,agri प्रोडक्ट्स मार्केटिंग ,डेरी,आदि से संभव है | लखनऊ के मानक नगर स्टेशन पर एक दूधिया अपना दूध स्टेशन पर फैला देता है -कारण ट्रैन टिकट एग्जामिनर | बेहतर हो ट्रैन में एक डिब्बा दूध वालों के लिए फिक्स किया जाये-उनके समय के अनुसार | हाँ,अपने डाक्यूमेंट्स खुद अटेस्ट करना ,छूटी नौकरियों के लिए इंटरव्यू का झंझट ख़त्म करना अच्छा कदम है ,वसर्ते छात्र ईमानदारी से पास हुआ हो " दिल्ली के लोगों को जब अलीगढ़ से दूध दिल्ली आता है इन दूधियों का बहुत बुरा अनुभव है

के द्वारा: Shobha Shobha

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आदरणीय दुबे जी, 'साईं' शब्द के इस आभिप्रायिक विमर्श तथा मानस के इन उद्धरणों के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! पर आप के प्रति मेरी ओर से 'दिलकुशा' शब्द का अभिप्राय बताना बकाया है | कई दिनों के बाद घर लौटा और आप की जिज्ञासा देखी तो सम्बंधित स्थान पर उत्तर दे दिया हूँ, किन्तु आप की निगाह से वह गुजरने से रह न जाय, इसलिए यहाँ भी उद्धृत कर रहा हूँ --- जालंधर में ‘दिलकुशा मार्केट’ है – यह जानकारी मुझे समाचारों के माध्यम से है, विस्तृत जानकारी नहीं है | लखनऊ में एक दिलकुशा एरिया है, कैंट एरिया से जुड़ा, उसी के आसपास और उसी क्षेत्र में गोमती नदी के तट पर 1800 ई. में निर्मित प्रसिद्ध ‘दिलकुशा कोठी’ है, जिसे गूगल पर सर्च करके देखा जा सकता है | सामान्यतया ‘दिलकुशा’ का अभिप्राय है दिल जहाँ खुश हो | ‘दिलकुशा’ शब्द ‘खुले हृदयवाला’, ‘उदार हृदय’ – जैसे अर्थों-अभिप्रायों के साथ प्रयुक्त हुआ है | कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं --- “अराइश-ए-ख्याल भी हो दिलकुशा भी हो/ वह दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो | जल्वा अयाँ है कुदरत-ए-परवर दिगार का/ क्या दिलकुशा ये सीन है फ़स्ल-ए-बहार का | गरचे है दिलकुशा बहुत हुस्न-ए-फरंग की बहार/ ताएरक-ए-बुलंद बाल दानो-दाम से गुजर |”

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

सभी पाठकों , स्नेही स्वजन -वरिस्ठ विद्वत्तजनो का सादर साधुवाद | यह रोज के अनुभव हैं ,इस शहर के |अब तो यह शहर भी मुझसे मोहब्बत सी करने लगा है ,यहाँ के वाशिंदे भी मुझसे मराठी में ही बोलने लगते हैं ,मैं समझने भी लगा हूँ ,कुछ -कुछ बोलने भी लगा -माला मराठी माहिती आहे | पर इस शहर का हवा पानी मेरे माफिक नहीं है,धनार्जन हो रहा ,पर मानसिक शांति नहीं |मोटरसाइकिल की भड़भड़ाहट , रेल की धड़धड़ाहट मानसिक विक्षुब्ध्धता पैदा करते हैं | यहाँ की प्रदूषित हवा ,शरीर में पीड़ा पैदा कर रही ,मेरे अनुभव तो यहाँ तक हैं ,मैं जैसे ही ट्रैन से ललितपुर पहुंचता हूँ ,शारीरिक थकान स्वतः मिटने लगती ,अतः यह हवा का प्रभाव ही है ,यहां की मूंगफली में वह स्वाद नहीं ,जो गंगा -जमुना दोआब क्षेत्र की मूंगफली में है |पर नियति को कोई नहीं टाल सकता,शायद नियति भी मुझे कुछ सिखाना चाह रही है | हरिः शरणम् |||

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के द्वारा: DEEPTI SAXENA DEEPTI SAXENA

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के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

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दुबे जी आपके विचारों में सार्थकता है ! बेकारों को दो घंटे ही सही करने को कुछ तो मिलेगा ! लेकिन जब तक भारतीयों के जहन में कि 'भारत मेरा देश है और मैं इसका नागरिक हूँ, इसको क्लीन ग्रीन रखना मेरा भी नैतिक कर्तव्य बनता है" नहीं आता तो बाहरी मन से भाड़े से किया काम आधा अधूरा ही रह जाता है ! आजकल मेरे पार्क सेक्टर १० द्वारका में रोज आर यस यस के एक नव जवान समाज सेवक श्री तिवारी जी अपने उनिफ़ार्म में पूरे पार्क का कचरा इकट्ठा करके एक बोर में भर कर कचरे के ढोल में डाल कर खुशी महसूस करते हैं ! एमसीडी के कर्मचारियों को इसी काम का वेतन भाता मिलता है लेकिन वे नहीं करते ! हमारे तिवारी जी तो लगातार २-३ घंटे के काम का किसी से कुछ नहीं माँगते न कोई सभ्रांत नागरिक उनकी इस निस्वार्थ सेवा की तरफ ध्यान ही केंद्रित करता है ! अगर सचमुच में देश को प्रधान मंत्री मोदी जी का भारत बनाना है तो हर नागरिक को अपने बडप्पन के खोल से बाहर निकल कर निस्वार्थ भाव से तिवाड़ी जी से सबक लेकर अपने इर्द गिर्द फैले कचरे को स्वेच्छा से उठाना होगा !

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दुबेजी आपका लेख सराहनीय है, और मैं तारा शाहदेव जी के अदम्य साहस को भी नमन करता हू| लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि एक कुशल निशाने बाज का निशाना अपनी निजी जिंदगी मे सही लक्ष्य क्यू नही भेद सका? जहा तक समाचार पत्रों के माध्यम से मुझे पता चला है कि 7 जून 2014 को इनकी पहली मुलाकात हुई थी और अगले महीने विवाह, और उसके अगले महीने विवाह टूट भी गया, ये सारे फ़ैसले इतनी जल्दी मे लिए गये कि तारा जी को टाइम ही नही मिला उस व्यक्ति को परखने का| मैं समझता हू तारा जी का ये फ़ैसला एक बहुत बड़ी भूल थी | और इस घटना के बाद सभी महिला और पुरुष पाठको से मेरा अनुरोध है कि जीवन मे कोई भी बड़ा या क्षोटा फ़ैसला लेने से पहले उसको खूब अच्छे से परख ले..धन्याबाद |

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चाहे जो हो आदरणीय दुबे जी, आप अपने तर्क पर सही हैं. हम अच्छे लोग, आम आदमी हमेशा भीरू होता है, कानून से डरता है, खुद से डरता है, समाज से डरता है, गुंडों से डरता है गुंडे के पास भी दो हाथ पैर ही होते हैं पर वे डरते नहीं है. नेता और उच्च पदस्थ लोग भी न कानून से डरते हैं, न भगवान से ...किसी न किसी को आगे तो आना ही होगा. भले उसका अंजाम जो भी हो ...भगत सिंह आदि बलिदानी अगर कानून की सोचते तो क्रांति नहीं आती...महिलाओं को अपने आप की रक्षा खुद ही करनी होगी. तारा शूटर कानूनी लड़ाई लड़ रही है ...हो सकता है मीडिया और पब्लिक के दबाव में अभी रक़ीबुल उर्फ़ रणजीत जेल में है... पर जैसे मामला ठंढा होगा उसे बेल मिल जाएगी ... सजा ही नहीं मिलती है अपराधियों को ... इसी लिए अपराध बढ़ते जाते हैं. पुराने लोग कहते हैं इससे तो ब्रिटिश राज अच्छा था क्योंकि उस समय सजा मिलती थी. लोगों में खौफ था. आज खाप पंचायतों का खौप है....बातें बहुत है...आपने सही ही लिखा है. किसी न किसी को आगे तो आना ही होगा...

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आदरणीय दुबे जी ! आपका कमेंट मैं जागरण के मुख्य पृष्ठ पर देखकर दुबारा जबाब दे रहा हूँ ! आप ये बताइये कि तेजाब फेंकमे वाले को क्या कानून माफ़ कर देगा ? लोंगो को आप गलत सलाह क्यों दे रहे हैं ? सुप्रीम कोर्ट के अभी हाल ही में दिए गए एक फैसले के अनुसार शोसल मिडिया पर गलत विचार व्यक्त करने पर किसी भी व्यक्ति को दण्डित किया जा सकता है,यदि वे विचार देश के कानून के विरुद्ध हैं ! यदि आप खुद अपराधियों को सजा देंगे तो कानून पुलिस और अदालत किसलिए है ? यदि आपकी सलाह मानकर या आपका लेख पढ़कर कोई ऐसा करता है तो आपको भी सजा हो सकती है ! आगे इस विषय पर मैं कोई चर्चा नहीं करूँगा ! आपकी जैसी इच्छा हो वैसा करें !

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दूसरी एक चिंता जो मुझे डिजिटल इंडिया को लेकर है,(जिसके ऊपर आईडिया वालों ने एक प्रचार अभियान भी टीवी पर चलाया -हम नहीं बनेगे उल्लू-तो क्या अभी तक हम सब उल्लू थे,खैर उल्लू इतना भी बुरा पक्षी नहीं है,आज के समय में उल्लू बनकर भी लक्ष्मी आ रही,तो हर कोई बनने के लिए तैयार हो ही जाएगा ), कहीं ऐसा न हो, हर मोबाइल पर अश्लील दृश्य का लुत्फ़ उठाने लगे, इस देश की किशोर और युवा पीढ़ी और कुछ वयस्क और बुजुर्ग भी,क्यों की दिल तो बच्चा है जी,थोड़ा सा कच्चा है जी | अतः डिजिटल इंडिया से पहले अश्लील साइट्स , MMS ,अश्लील भाषा और दंगे भड़काने वाले चित्रों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना अत्यावश्यक है | आपकी चिंता जायज है. जनता तो इन्ही सब में भूली रहेगी किसे प्रवचन याद रहेगा.और रहेगा तो उसी प्रकार जैसे शिकारती आएगा जाल बिछाएगा... अच्छे दिन आने वाले हैं और नहीं बनेंगे उल्लू ये कुछ मन्त्र होंगे जो गायत्री मन्त्र से भी ज्यादा शक्तिशाली होंगे... ...आत्म श्लाघा किसे अच्छी नहीं लगती...

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आप ठीक कहा रहे हैं, पर आज हमारे आदर्श राम नहीं वरन शाहरुख़ और सलमान. अमिताभ और अभिषेक हैं ...विद्या बालन और दीपिका, प्रियंका, सनी लियोन और भी बहुत सारे बड़े और छोटे परदे के नायक नायिकाएं हैं. रामायण की चौपाइयां आज के लोगों को भले ही याद न हो पर फिल्मों के डायलाग - बसन्ती इन कुत्तों के आगे मत नाचना और भी बहुत कुछ जो आप सभी जानते हैं... आज के बच्चे इनकी ही नक़ल करते हैं और बाजारों में ऐसे कपड़ों की भरमार और मांग भी है. दिक्कत यह है कि जो log ऐसे कपडे पहनते हैं वे कड़ी surkasha के बीच रहते हैं और शिकार मासूमों को होना पड़ता है ..आप ने अपनी राय rakkhee वह सही है bakee वे log samjhen और सरकार और समाज दोनों का दायित्व तो बनता ही है ऐसी घटनएं न हो जो दरिंदगी की had तक गुजर जाती हैं...

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ब्लॉग बुलेटिन की आज बुधवार ३० जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- बेटियाँ बोझ नहीं हैं– ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... एक निवेदन--- यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया ब्लॉग बुलेटिन ग्रुप से जुड़कर अपनी पोस्ट की जानकारी सबके साथ साझा करें. सादर आभार!

के द्वारा: डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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श्री दूबेजी उत्तर प्रदेश में शायद वर्ष अच्छी तरह याद नहीं है १९६६ -६७ में अंग्रेजी के खिलाफ आंदोलन हुआ था जिसमें सब से अधिक बढ़ चढ़ कर यू .पी. ने हिस्सा लिया था अब अंग्रेजी अनिवार्य भाषा नहीं रही थी हमारा प्रदेश उसके बाद कितना पिछड़ा सब जानते हैं जब तक हमारी अपनी टेक्नोलॉजी नही हम अंग्रेजी को कैसे छोड़ सकते है साइंस के लिए अंग्रेजी कितनी आवश्यक थी जिन माता पिता ने बढ़ चढ़ कर अंग्रेजी का वितोध किया था उन्होंने ही अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाई और आई टी के क्षेत्र में हम कितना आगे हैं कितना डॉलर भारतीयलोगो ने भेजा अंग्रेजी हमें विश्व से जोड़ रही है मुझे क्षमा कीजियेगा मेरी ऐसी सोच है हम शिक्षा के क्षेत्र में चीन से आगे हैं हाँ चीन में अंग्रेजी पढ़ने का रिवाज शुरू हो गया है| डॉ अशोक

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PREVIOUS “छाता लेने जायेंगे क्या?” पोस्टेड ओन: 7 Jul, 2014 जनरल डब्बा, सोशल इश्यू में Rss Feed SocialTwist Tell-a-Friend मैंने तपाक से कहा- नहीं,शायद उन्हें भी पूर्वाभास था ,मेरे उत्तर का,तभी तो बहुत धीरे से और संकुचित होकर कहा.अब मात्र इतने से तो आप को पूरी कहानी की स्पष्ट समझ होगी नहीं,विस्तार से सुननी पड़ेगी,तो आगे लिखते हैं - हमारी गली में कुछ दिवस पूर्व एक पोस्टर लगाया गया,स्कूल के छात्रों को फ्री में छाता वितरण किया जाएगा,जिसे मैंने उसी दिन देख और समझ लिया था,जब वह पोस्टर लगा था.मैंने सोचा-यह फिर कोई नेता,रेवड़ी बाटने का कार्यक्रम कर रहा,वोट बटोरने के लिए.पर यही तो लोकतंत्र है.आखिरकार,कल छाते बाँटे गए.नेता जी की उदारता को प्रणाम; उनका सौभाग्य ,जो छाता हासिल करने में कामयाब हो गए;उनके प्रति सहानुभूति ,जिन्हे नहीं मिल पाया. हमारी बिल्डिंग में एक लेडीज टेलर की दुकान,जैसे ही हम बाहर निकलते,तो उन्ही का दर्शन होता,उसमे एक लेडीज कार्य करती,दिन में उसके पति,हमारे भाईसाहब ड्यूटी जाते,स्पेयर समय में वह भी उसी दुकान पर समय देते,अच्छा कार्य है.पर बात करना तो कोई लेडीज से सीखे.यदि आप को समझना है -राजनीती की भाषा,कूटनीति की भाषा तो इन महिलाओं के दो बोल अवश्य सुन लिया करना प्रतिदिन,धीरे -धीरे आप परिपक्व हो जायेंगे,बातें करने में.बातें सुनने के लिए नज़रे मिलाने की कोई जरूरत नहीं हैं,इसीलिये हमारे निर्माता ने कान साइड में रखे और आँखे सामने.इधर -उधर से सुनते रहो और आगे चलते रहो. वैसे तो अपने पास एक छाता है ही,पर हमारे डेढ़ वर्षीय सुपुत्र ने मम्मा,पापा के बाद गाय और छाता कहना ही शुरू किया.दिन में कम से कम ५० बार गाय और छाता कह ही देतें होंगे.बाल हठ क्या नहीं कर सकती और यदि त्रिया हठ भी साथ में मिल जाये,तो हठी राजा भी अपनी हठ छोड़कर आत्मसमर्पण कर देगा. एक दिन मैंने अपने लाल का बाल मन बहलाने के लिए,अपने ड्यूटी बैग से छाता निकाल कर थमा दिया,मैंने सोचा २ वारिश इस छाते ने निकाल ही दी,तीसरी के अंत होते -होते शायद इसका भी अंत होना ही लिखा होगा,मेरे बच्चे के नन्हे हाथों से. पर जैसे ही साहब ने छाता थामा,उसको दो बार जमीन पर पटक कर तीन ताने तोड़ दीं.बच्चा,उसकी माँ,मेरी माँ सब खुश,केवल मैं और छाता ही दुखी थे. कल जब छाता वितरण का कार्यक्रम,जो ऊंची दुकान और फीकी पकवान,के मुहावरे को पूर्ण चरितार्थ कर रहा था,चल रहा था.मैं जैसे ही मार्केट से घर-गृहस्थी का सामान लेकर लौटा,हमारी धर्म पत्नी जी टेलर की दुकान के पास ही बोल दीं -छाता बट रहा इधर कहीं,”नन्नू” के लिए लेने जाओगे क्या?,यह दीदी अपनी “नियति”(टेलर की बेटी) के लिए ले आयीं.मैं तत्काल समझ गया-यह सुझाव,इन्ही दीदी जी का होगा.मैंने अपनी मैडम को समझाते हुए कहा -स्कूली बच्चों को दे रहे,सबको नहीं.बोली नहीं -उनकी बच्ची तो नहीं पढ़ती,पर मिल गया.मैंने कहा ,मैं नहीं जाऊंगा ,फ्री की जीज लेने,वह भी बच्चे के लिए . तब तक एक माँ ,जो अपने ३-४ वर्षीय छोटे बच्चे को लेकर छाता लेने गयी थी,बेचारी मुह लटकाकर वापस आ गयी,वह मारवाड़ी महिला बोली-उन्हीं को दे रहे ,जिनका वोटर लिस्ट में नाम हैं.मैडम जी तब तक अंदर जा चुकी थी,बाद में जाकर हमने बताया,वह दूसरी लेडी ऐसा बोल रही थी. मैंने अपने बाबा जी को याद करते हुए,उनका वक्तव्य और वह खेत का स्थान पुनः-पुनः याद किया जिसमे उन्होंने कहा था -” हमेशा भगवान से मांगो,वह १००० हाथ से बाँट रहा है,यह दो हाथों वाला इंसान किसी को क्या दे सकता है?”. और शाम तक एक छोटा छाता दुकान से लाकर बच्चे के हाथ में थमा दिया ye antim panktiyaan bahut pasand aayee aadarniya doobey jee

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ये संसार आत्मा, परमात्मा और प्रकृति का खेल है. ये तीनों की नित्य हैं. परमात्मा सदा एकरस है, परम पवित्र है. शरीरधारी ना होने के कारण उसके गुण और शक्तियां सदा सर्वदा एक सी हैं इसी लिए उसे सदा "शिव" कहते हैं. शिव कर अर्थ है कल्याणकारी. आत्मा को प्रकृति का आधार लेना होता है, इसलिए आत्मा और प्रकृति की गुण और शक्तियां कम ज्यादा होती हैं. इन्ही गुण शक्तियों के आधार पर ही पुण्य आत्मा, पाप आत्मा, महान आत्मा, धर्म आत्मा, देव आत्मा का निर्धारण होता है. जब आत्मा शरीर में है तब उसे जीव आत्मा कहते हैं. शरीर आत्मा का वस्त्र है. आत्मा इस शरीर की मालिक है. अस्तित्व आत्मा का है शरीर तो विनाशी है, शरीर का अस्तित्व तभी तक है जब तक आत्मा उस शरीर में है. अच्छा लेख. कभी हमारे ब्लॉग पर भी पधारें http://rjanki.jagranjunction.com पुण्यात्मा, देवात्मा, धर्मात्मा इनको भी पकड़ लेते

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